क्या है बड़े दिग्गजों के लिए आदमपुर हार-जीत के मायने, इस खबर में समझें

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क्या है बड़े दिग्गजों के लिए आदमपुर हार-जीत के मायने, इस खबर में समझें

आदमपुर का चुनाव हुड्डा पिता पुत्र के लिए नाक का सवाल था और इसमे उन्हे कामयाबी नहीं मिली
 
क्या है बड़े दिग्गजों के लिए आदमपुर हार-जीत के मायने, इस खबर में समझें

आदमपुर उपचुनाव बीजेपी ने जीत लिया है ये आप सबको खबर हो चुकी होगी. लेकिन इस जीत और हार से बड़े लीडर्स को क्या हासिल हुआ या क्या खोने के आसार बने हैं हम आपको इस खबर के जरिए सबकुछ बताने की कोशिश करेंगे.

ये एक उपचुनाव की हार जीत नहीं है बल्कि इसके बहुत मायने हैं, इस हार जीत के दिग्गजों के लिए कई मायने हैं. भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रत्याशी भव्य बिश्नोई को जिता कर CM मनोहर लाल खट्‌टर ने अपनी लीडरशिप को 2024 से पहले ही साबित कर दिया है. वहीं कांग्रेस की हार से पूर्व CM भूपेंद्र सिंह हुड्‌डा और उनके बेटे दीपेंद्र हुड्‌डा कमजोर साबित हुए.

आम आदमी पार्टी (AAP) को इससे झटका लगा है क्योंकि वह कोई चमत्कार दिखाना तो दूर, मुकाबले में ही नहीं आ सके. इंडियन नेशनल लोकदल (INLD) के लिए आदमपुर का परिणाम हरियाणा में उनके राजनीतिक दौर खत्म होने का संकेत दे रहा है. यह भी साफ किया कि ऐलनाबाद उपचुनाव में अभय चौटाला की जीत, उनकी या इनेलो की नहीं बल्कि किसान आंदोलन के समर्थन की वजह से थी.

क्या है बड़े दिग्गजों के लिए आदमपुर हार-जीत के मायने, इस खबर में समझें
हुड्डा पिता पुत्र की जोड़ी इस चुनाव में कमाल नहीं दिखा सकी

खट्‌टर की रणनीति से जीत कैसे मिली?

कुलदीप बिश्नोई को कांग्रेस से BJP में लाकर पूर्व CM भजनलाल की साख का लाभ उठाया. कुलदीप के इस्तीफे के बाद उपचुनाव होने तय थे लेकिन खट्‌टर ने इसकी घोषणा का इंतजार नहीं किया. वहां विकास कार्य कराने शुरू कर दिए.

लोगों को भरोसा दिलाया कि अगर बिश्नोई परिवार जीता तो आगे भी विकास के काम होते रहेंगे. कुलदीप से लोगों की नाराजगी थी तो भव्य को चुनाव मैदान में उतारने पर सहमति बनाई. पहले युवाओं से संवाद किया, फिर अंतिम दिन रैली में जाकर सरकार को बिश्नोई के साथ खड़ा कर दिया. जिससे लोगों का भरोसा और मजबूत हुआ.

खट्‌टर को इससे क्या मिला?

खट्‌टर ने इस जीत से हरियाणा में अपनी लीडरशिप साबित की. खट्‌टर ने बताया कि यूं ही नहीं भाजपा ने उन्हें लगातार 2 टर्म में 8 साल से CM बना रखा है. खट्‌टर ने 2024 के लिए फिर से BJP की अगुआई करने की दावेदारी मजबूत कर दी है.

8 साल के कार्यकाल में 3 उपचुनाव हारे. विस चुनाव से पहले जीत से पार्टी के हक माहौल तैयार किया. खासकर, 2024 में लोकसभा चुनाव भी होने हैं, ऐसे में पार्टी हाईकमान के आगे खुद को मजबूत बनाया है.

भूपेंद्र हुड्‌डा ने क्या खोया-क्या पाया?

भूपेंद्र हुड्‌डा ने यहां कुछ नहीं पाया, सिर्फ खोया ही खोया है. आदमपुर में हुड्‌डा पिता-पुत्र ने साख दांव पर लगा रखी थी, जो बच नहीं पाई. हुड्‌डा को पहला झटका कांग्रेसियों ने ही दिया. गुटबाजी में बंटी कांग्रेस में पूर्व प्रधान कुमारी सैलजा के अलावा किरण चौधरी और रणदीप सुरजेवाला जैसे दिग्गज प्रचार में नहीं आए.

हुड्‌डा पिता-पुत्र इसे 2024 का सेमीफाइनल बता रहे थे. लोगों को कह रहे थे कि यह सीट जीते तो हुड्‌डा तीसरी बार सीएम बनेंगे. लोगों ने उनकी इस ख्वाहिश को जमीन पर मसलकर फेंक दिया. इस हार से संगठन के भीतर भी हुड्‌डा की राह मुश्किल होगी. खासकर, इसलिए क्योंकि कांग्रेस में मल्लिकार्जुन खड़े नए-नए राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं.

AAP को संदेश, हरियाणा को पंजाब न समझें

आम आदमी पार्टी हरियाणा से बड़ी उम्मीदें पाले बैठी थी. अरविंद केजरीवाल ने भी खुद को हरियाणा का छोरा बताकर वोट मांगे. हालांकि लोगों ने उन्हें वोट नहीं दिए. आप को साफ संदेश मिला है कि हरियाणा उनके लिए पंजाब जैसा नहीं, जहां पहले ही चुनाव में कोई चमत्कार हो जाएगा. अभी उन्हें खुद को साबित करने के लिए हरियाणा में काफी मेहनत करनी होगी.

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